‘गुड़म्बा’ मशहूर
लेखक ज़ावेद सिद्दीकी द्व्रारा लिखित तथा सलीम आरिफ़ द्वारा निर्देशित एक संवेदनशील एकल
नाटक, 27 जुलाई को सूरसदन प्रेक्षागृह में अभिनीत किया गया। नाटक के प्रारम्भ में सहजता
से अभिमुख होती हुई, इस एकल नाटक की कलाकार लुबना सलीम ने क्षण भर में दर्शकों से आत्मीयता
स्थापित कर ली, फिर एक पात्र में अनेक पात्रों को जीती हुई, कभी अपने जीवन के पुराने
समय और कभी वर्तमान में दर्शकों को पहुँचाती रही। नाटक की मुख्य और एकमात्र पात्रा
अमीना(लुबना सलीम) अपने पति, बेटे और बहू के साथ रहती है। एक औरत की समाज में निम्नतर
स्थिति इस नाटक के माध्यम से स्पष्ट होती है, जिसको उसका पिता, पति और पति के घर वाले
अपने आधीन रखते हैं।
Tuesday, July 30, 2019
Sunday, April 28, 2019
फिल्मों के विदाई के गीतों में महिलाओं की असहायता का महिमामंडन
Source: Shemaroo Videos
अमिता चतुर्वेदी
एक लड़की के विवाह से ही ‘विदा’ शब्द जुड़ा होता है क्योंकि उसके जीवन में अपने घर से जिस तरह का निष्कासन होता है, वह और किसी के साथ नहीं होता। एक लड़की के अतिरिक्त घर का कोई भी सदस्य वापस अपने घर में एक मेहमान के रूप में नहीं आता। विदा के समय घर के दरवाजे से कदम निकालते ही उसे आभास कराया जाता है कि यह घर अब उसका नहीं है। उसे अपने घर से परायेपन की अनुभूति होने लगती है। ‘पराया’ का सीधा अर्थ लगाया जा सकता है कि अब लड़की के सुख-दुख से उसके घर वालों का कोई सम्बन्ध नहीं है और विदा के समय निकले पहले कदम के साथ ही उसका सम्बन्ध उस घर से सदा के लिए समाप्त हो जाता है; उस घर से, जहाँ उसके बचपन, किशोरावस्था और यौवन की यादें उसके मन में सदा समायी रहती हैं ।
अमिता चतुर्वेदी
एक लड़की के विवाह से ही ‘विदा’ शब्द जुड़ा होता है क्योंकि उसके जीवन में अपने घर से जिस तरह का निष्कासन होता है, वह और किसी के साथ नहीं होता। एक लड़की के अतिरिक्त घर का कोई भी सदस्य वापस अपने घर में एक मेहमान के रूप में नहीं आता। विदा के समय घर के दरवाजे से कदम निकालते ही उसे आभास कराया जाता है कि यह घर अब उसका नहीं है। उसे अपने घर से परायेपन की अनुभूति होने लगती है। ‘पराया’ का सीधा अर्थ लगाया जा सकता है कि अब लड़की के सुख-दुख से उसके घर वालों का कोई सम्बन्ध नहीं है और विदा के समय निकले पहले कदम के साथ ही उसका सम्बन्ध उस घर से सदा के लिए समाप्त हो जाता है; उस घर से, जहाँ उसके बचपन, किशोरावस्था और यौवन की यादें उसके मन में सदा समायी रहती हैं ।
यही परम्परा और प्रथा पुराने समय से लेकर आज तक चली आ रही
है। एक लड़की के पराये होने के सामजिक बोध के इस कटु सत्य पर आधारित, फ़िल्मों में कितने
ही गाने बनाए गए हैं, जिनमें वह अपने घर-आँगन की याद कर रही होती है। ये गाने लड़की
के पराये होने के बोध को व्यक्त करने के साथ, समाज की इसी सोच को और पुष्ट करते हैं।
प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ गीतों का विश्लेषण-
Tuesday, March 19, 2019
एक सड़क-दुर्घटना का समाजशास्त्र
सात दिसम्बर
2017 की रात एक दुर्घटना ने मेरे जीवन में अनेक नये अनुभव जोड़ दिए। रोज की तरह जिम
से, स्कूटी पर लौटते हुए, मैं अपनी कॉलौनी तक पहुँचने वाली थी। डिवाईडर के कट पर खड़ी
हुई थी, बस सड़क को पार कर सामने जाना था। हेलमेट पहने हुए थी। मैंने सीधे हाथ का इंडीकेटर
दे दिया था। वाहन एक के बाद एक आ रहे थे, मेरी नजर बाँईं तरफ़ लगी हुई थी। जब मैंने
देखा कि अगला वाहन कुछ दूर है तो सड़क पार करने लगी। थोडा सा बढ़ी थी कि सहसा एक बीस-बाईस
साल के मोटर साईकिल सवार लड़के ने मेरी स्कूटी में जोर से ट्क्कर मार दी। वह लड़का इतनी
तीव्रता से आया कि न तो मुझे वह आता हुआ दिखा और न ही मुझे टक्कर होने की आवाज सुनाई
दी, जो लोगों को काफ़ी
दूर तक सुनाई दी थी। मुझे केवल पता चला कि मुझे कुछ हुआ है। शायद हल्की सी बेहोश हो
चुकी थी। बस इतना ध्यान रहा कि कोई पूछ रहा है कि आपके पति का क्या नाम है, जो मैंने
बता दिया। पूछने वाले पास ही स्थित पुलिस चौकी के आदमी थे।
Tuesday, October 30, 2018
गौरैया की मेरे घर से पहचान
बचपन की परिचित गौरैया, जब दिखनी बंद हो गई थीं, तब निगाहें उन्हें ढूँढती रहती थीं। मैं जगह-जगह बैठे पक्षियों में देखती थी, शायद इनमें कभी गौरैया भी दिख जाए। इसके बाद कभी-कभी एक दो गौरैयाँ बिजली के तारों पर,सबसे दूरी बनाते हुए बैठी दिखीं। उनको नीचे लाने के लिए घर के बाहर चावल डाले और काफी समय तक डालते रहने पर, एक दो गौरेया आने लगी, पर वहाँ उन्हें शायद कुत्ते, बिल्ली से सुरक्षा का एहसास नहीं था, इसलिए फिर कम आने लगीं। मेरा मन था कि घर में कहीं किसी जगह गौरैया आ कर दाना चुगें जैसा बचपन में होता था। लगता है कि पक्षी भी मन की भाषा समझते हैं। गौरैयाँ अब मेरे घर में चावल खाने के लिए आने लगीं हैं। कहते हैं कि गौरैयाँ काफी समय तक किसी जगह को देखती हैं कि वह सुरक्षित है या नहीं। बहुत समय तक दाना डालते रहने के बाद आखिर गौरैयों ने मेरे घर को पहचान लिया है। अमिता चतुर्वेदी
Tuesday, September 4, 2018
शतरंज के खिलाड़ी में सामंतवाद और रीतिकालीन साहित्य के अवसान का आभास
किसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर
आधारित कहानी को गहराई से समझने के लिए, उसके देशकाल, वातावरण, और उद्देश्य से अवगत होना आवश्यक है। शतरंज
के खिलाड़ी महान उपन्यासकार प्रेमचन्द की वाजिद अली शाह के शासनकाल को चित्रित करती
हुई एक उत्कृष्ट रचना है।
वाजिद अली शाह लखनऊ और अवध के
नबाब थे जिनका शासनकाल सन 1847 से 1856 तक
रहा। इसी समय अंग्रेजों ने भी भारत में शासन किया। यह हिन्दी
साहित्य के इतिहास का आधुनिक काल था जिसके पूर्व
रीतिकाल में साहित्य रचना राजदरबारों तक सीमित हो
गई थी। इस समय कवियों को राज
दरबारों में आश्रय प्राप्त था जो राजाओं की चाटुकारिता में कविताएं लिखते थे।
रीतिकाल के बाद हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में खड़ी बोली गद्य
का आविर्भाव हुआ। इस समय के प्रमुख लेखकों में प्रेमचन्द ने सर्वप्रथम यथार्थवाद
को अपने उपन्यासों और कहानियों में स्थान दिया। उनका यथार्थवाद तत्कालीन राजनीतिक,
सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित था।
Sunday, April 8, 2018
Saturday, April 7, 2018
कभी रूठी गौरैयाँ जब फ़िर मिलीं
यादों के बहुत से झरोखे होते हैं। किसी भी समय कोई एक झरोखा एक झोंके से खुल जाता है और हम यादों में खो जाते हैं। एक याद से जुड़कर दूसरी याद, दूसरे से तीसरी, आगे और बढ़ते हुए पुराने जीवन में कुछ समय के लिए पहुँचा देती है। ऐसी ही कुछ यादों में से बचपन और युवावस्था से जुड़ी मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या में घुली-मिली गौरैया, एक झरोखे से दिखती है।
Monday, February 12, 2018
जयशंकर प्रसाद के गद्य साहित्य में पद्य और काव्यात्मकता की छाया
जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य साहित्यकार हैं जिन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक तथा निबन्ध सभी विधाओं में रचना की है। छायावादी युग के प्रमुख स्तम्भकारों जैसे पन्त, निराला तथा महादेवी वर्मा के मध्य उनका भी प्रमुख स्थान है। जय शंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 बनारस में हुआ और 15 नवम्बर 1930 में, 47 साल की अल्पायु में ही निधन हो गया। इतनी अल्पावधि में भी प्रसाद ने अपनी प्रतिभा से हिन्दी के साहित्याकाश को आलोकित कर दिया।
प्रसाद ने अपने निबन्ध ‘यथार्थवाद और छायावाद’ में छायावाद जिसे रहस्यवाद भी कहा जाता है, का उल्लेख करते हुए लिखा है ‘कविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुन्दरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूति अभिव्यक्त होने लगी, तब उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया’। साथ ही प्रसाद का कहना है, ‘छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है'। प्रसाद की रचनाओं में उनके इन्हीं विचारों की अभिव्यक्ति है।
प्रसाद ने अपने निबन्ध ‘यथार्थवाद और छायावाद’ में छायावाद जिसे रहस्यवाद भी कहा जाता है, का उल्लेख करते हुए लिखा है ‘कविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुन्दरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूति अभिव्यक्त होने लगी, तब उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया’। साथ ही प्रसाद का कहना है, ‘छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है'। प्रसाद की रचनाओं में उनके इन्हीं विचारों की अभिव्यक्ति है।
Tuesday, November 14, 2017
हिंसा और वीभत्सता से ओत-प्रोत आधुनिक पौराणिक उपन्यास
धर्म और साहित्य का सम्बन्ध आज एक नया रूप ले चुका है, जिसके
फ़लस्वरूप पौराणिक कथाओं पर आधारित अनेक उपन्यास आजकल लोकप्रिय हो रहे हैं। इन
उपन्यासों में पौराणिक पात्रों को नवीन परिवेश में रूपान्तरित कर, बड़ी
कुशलता से आज देश में आक्रामक रूप से हिंसा
का प्रश्रय लेती हुई, धार्मिकता का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही
इनमें वर्णित ब्राह्णणवाद, जातिवाद, छूआछूत, असमानता और वर्गीय हिंसा तथा घृणा को विस्तृत
रूप में व्यक्त किया जा रहा है, जिससे इन विषमताओं के प्रबल होने की संभावनाएँ
हैं, जिसके कारण समाज के पुनः पुराने दौर में जाने का खतरा हो सकता है। ऐसे ही
उपन्यासों में अमीश त्रिपाठी का ‘मेलुहा के मृत्युंजय’ और अशोक के बैंकर का ‘अयोध्या
का राजकुमार’ समाहित हैं।
Sunday, February 7, 2016
महिलाओं का सीमित होता कार्यक्षेत्र
भारतीय सामाजिक
संरचना में अधिकांश महिलाओं का दायरा घरेलू कार्यों के लिये और पुरुषों का बाहरी
कार्यों के लिये सुनिश्चित किया गया है। महिलाएँ बचपन से ही घरेलू कार्यों को
सीखती हैं जिससे व्यस्क होने तक घर की सभी कामों की जिम्मेदारी उठा सकें।
युवावस्था से बुढ़ापे तक उनको सभी घरेलू कार्य करने पड़ते हैं और आवश्यकता होने पर
भी पुरुषों का सहयोग नहीं मिलता। यह स्थिति घरेलू और कामगार दोनों ही महिलाओं की
है। घरेलू कार्यों में महिलाओं की दिनचर्या में कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं होता और
ना ही सेवा निवृत्ति की कोई उम्र सीमा होती है। जब तक उनका शरीर शिथिल नहीं होता
या वो अस्वस्थ नहीं हो जातीं तब तक घरेलू कार्यों में उनकी व्यस्तता बनी रहती है।
राष्ट्रीय प्रतिदर्श
सर्वेक्षण कार्यालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 2011-2012 के
68 वें दौर के सर्वेक्षण पर आधारित “घरेलू
कार्यों के साथ-साथ विनिर्दिष्ट क्रियाकलापों में महिलाओं की भागीदारी” नामक रिपोर्ट इसी व्यवस्था की पुष्टि करती है। इसके
अनुसार घरेलू कार्यों में कार्यरत महिलाओं का अनुपात ग्रामीण और नगरीय, दोनों ही क्षेत्रों
में निरन्तर बढ़ा है।
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