Tuesday, March 19, 2019

एक सड़क-दुर्घटना का समाजशास्त्र




सात दिसम्बर 2017 की रात एक दुर्घटना ने मेरे जीवन में अनेक नये अनुभव जोड़ दिए। रोज की तरह जिम से, स्कूटी पर लौटते हुए, मैं अपनी कॉलौनी तक पहुँचने वाली थी। डिवाईडर के कट पर खड़ी हुई थी, बस सड़क को पार कर सामने जाना था। हेलमेट पहने हुए थी। मैंने सीधे हाथ का इंडीकेटर दे दिया था। वाहन एक के बाद एक आ रहे थे, मेरी नजर बाँईं तरफ़ लगी हुई थी। जब मैंने देखा कि अगला वाहन कुछ दूर है तो सड़क पार करने लगी। थोडा सा बढ़ी थी कि सहसा एक बीस-बाईस साल के मोटर साईकिल सवार लड़के ने मेरी स्कूटी में जोर से ट्क्कर मार दी। वह लड़का इतनी तीव्रता से आया कि न तो मुझे वह आता हुआ दिखा और न ही मुझे टक्कर होने की आवाज सुनाई दी, जो लोगों को काफ़ी दूर तक सुनाई दी थी। मुझे केवल पता चला कि मुझे कुछ हुआ है। शायद हल्की सी बेहोश हो चुकी थी। बस इतना ध्यान रहा कि कोई पूछ रहा है कि आपके पति का क्या नाम है, जो मैंने बता दिया। पूछने वाले पास ही स्थित पुलिस चौकी के आदमी थे।
सबसे सुखद बात थी कि उन पुलिस कर्मचारियों ने मेरी बहुत सहायता की। उन्होंने मेरे पति और बेटों को मेरे फोन से सूचित किया। इसी बीच उन्होंने एम्बुलेंस बुला कर अस्पताल ले जाने का इंतजाम कर दिया था अन्यथा मैं चलती सड़क पर घायल अवस्था में पड़ी रहती। मेरे चेहरे, सिर और नाक पर चोट लगी थी जिनसे खून बह रहा था। पुलिस के सहयोग से मैं बच गई परन्तु उनकी एक बात से आघात पहुँचा। उन्होंने कहा कि “मैडम की गलती थी”। पुलिस के कर्मचारी हमेशा पुलिस चौकी में ही बैठते हैं। वे कोई ट्रैफिक पुलिस नहीं है जो सड़क पर खड़ी रहती है। पुलिस चौकी भी घटना स्थल से कुछ दूरी पर थी। फिर वे वहीं बैठे हुए कैसे देख सकते थे कि किसकी गलती है। जबकि लड़के के घर वाले खुद कह रहे थे कि उनके लड़के के कारण मुझको इतनी चोट लग गई। इस समय यही लगा कि बाहरी दुनिया में गलती किसी की भी हो पर थोपी औरत पर ही जाती है। मन ही मन उन पुलिस वालों को धन्यवाद देती हूँ पर उनकी सोच के कारण उनके पास जाकर आभार व्यक्त करने का मन नहीं हुआ। पुलिस के लिए मन में जो बुरी धारणा थी वो दूर तो हो गई पर उनके मन में औरतों के लिए बसी धारणा से सामना भी हुआ।
कुछ ठीक होने पर जब घर से बाहर निकली, तो एक साथ दो विपरीत सोच वाले लोगों से साक्षात्कार हुआ। पहली बात यही लोगों के लिए अजीब हो जाती है कि मैं 58 साल की उम्र में जिम जाती हूँ और दूसरी बात यह कि स्कूटी से जाती हूँ। ये दोनों ही बातें एक सीमित दायरे में केन्द्रित समाज के लिए असहनीय हैं। परन्तु कुछ स्वतन्त्र मानसिकता के लोग भी समाज में हैं जिनकी वजह से उन लोगों को प्रोत्सहन मिलता है जो कुछ अलग करना चाहते हैं। जिम में मिलने वाले पहले इंसान की बात सुनकर हिम्मत बढ़ी। उन्होंने कहा, “आप अपना व्यायाम छोड़ना नहीं। आपसे हमको प्रेरणा मिलती है।“ साथ ही वहाँ का ट्रेनर मुझे पहले की तरह व्यायाम करने के लिए प्रेरित करता रहा।
पर इसके उलट वहाँ का दूसरा ट्रेनर मेरे हाल-चाल पूछकर बोला, “अब आप स्कूटी मत चलाना”। उसे मैंने उत्तर दिया “वो तो मैं चलाँऊगी।“ कुछ दिन बाद वहीं एक पति-पत्नी आए। उन्होंने भी मेरे हाल-चाल लिए। फिर पति महाशय बोले “आप स्कूटी चलाना छोड़ दो”। पत्नी भी उनकी बात से सहमत थीं जबकि वो स्वयं गाड़ी चलाती हैं परन्तु उन्हें यह कहने का हक शायद इसलिए मिल गया कि वह मुझसे उम्र में काफ़ी छोटी हैं। मैंने कहा कि सड़क पर अधिकांश दुर्घटनाएं पुरूषों के कारण और पुरुषों के साथ ही होती हैं पर उनसे कोई नहीं कहता कि अब वे कोई भी वाहन ना चलाएँ । यदि एक औरत दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है, तो उसे वाहन चलाने से तुरंत मना किया जाता है। एक बुजुर्ग महिला ने दुर्घटना के बाद मेरे हाल-चाल पूछने के बाद कहा, “अब तुम ये स्कूटी-विस्कूटी चलाना छोड़ दो।“
इस दुर्घटना से पहले भी एक लड़के ने मुझसे कहा था कि तीस साल की उम्र के बाद औरतों को दुपहिया वाहन नहीं चलाना चाहिए क्योंकि अगर उनकी कोई हड्डी टूट जाए तो मुश्किल में ठीक होती है। यह बात भी उसने तब कही जब मैं स्कूटी चालू कर सड़क पर निकलने वाली थी। यानि निकलने से पहले ही महाशय ने शगुन कर दिया। मेरी एक परिचित महिला स्कूटी चलाना चाहती थी। जब अपने घर में उन्होंने अपनी इच्छा जताई तो उनका बेटा बोला “मम्मी आप गिर गईं और चोट लग गई तो खाना कौन बनायेगा?” ऐसी बातें महिलाएं हँसते हुए बताती हैं क्योंकि वे यह सब सुनने की आदी हो गई हैं। वे किसी से कुछ सवाल नहीं करतीं।
मुझे लोगों से बातें सुननी पड़ी क्योंकि मैं एक औरत हूँ और बड़ी हो गई हूँ। औरतों को बाहर निकलने से रोकने से, इसी प्रकार नियन्त्रित किया जाता है, जिससे वे घर के ही काम करें और विवाह से पहले के अपने पिछले जीवन के पढ़ने-लिखने, खेलने, स्वयं अपने काम करने, वाहन चलाने आदि के जो कुछ अच्छे अनुभव अर्जित किए हैं, वे पूरी तरह भूल जाएं। फलस्वरूप स्त्रियाँ बड़े होकर केवल खाना बनाने, सफाई करने और दूसरों का जीवन संभालने में ही समय व्यतीत करती रहती हैं। आदमी उन्हें ये सब करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि घर के काम निर्विघ्न होते रहने से उन्हें फ़ायदा रहता है। औरतें अच्छे खाने, अच्छी सफ़ाई, घर की सजावट आदि की प्रशंसा की खुशी में डूबी रहती हैं। इस प्रकार महिलाएं स्वयं एक घिसी-पिटी जिन्दगी जीकर ही खुश रहने पर विवश हो जाती हैं और चाहती हैं कि बाकी औरतें भी वैसे ही जीती रहें। इसीलिए बाहरी दुनिया में औरतों की सक्रियता बहुत कम रहती है और उनका अनुपात आदमियों से बहुत कम रहता है। जो औरतें बाहर निकलती हैं, आदमी चाहते हैं कि वे भी बाहर न निकलें, जिससे औरतों की बाहर के कामों के लिए उन पर निर्भरता बनी रहे।
इस दुर्घटना ने चली आ रही दकियानूसी सामाजिक सोच को मेरे सामने पुनः प्रकट कर दिया। सच तो यह है कि महिलाओं को अपनी इच्छा के काम चुनने की स्वतन्त्रता नहीं है। समाज के पुरुष बताते हैं कि एक औरत क्या कर सकती है और क्या नहीं। वे स्वयं निर्णय नहीं ले सकतीं। महिलाओं की स्वतन्त्रता छीनने वालों में युवा पीढ़ी के लोग और स्वयं महिलाएं भी शामिल हैं, जो बहुत निराशाजनक है। औरतों को नहीं मालूम कि घर में ही सीमित रहकर वे एक नीरस जिन्दगी गुजारती हुई केवल अपनी उम्र के पन्ने पलटती रहती हैं। उन पलों को, जो उनके पास हैं, बोझिल मन से जीती हुई, आगे आने वाले जीवन के खाली पन्नों का हिसाब लगाती रहती हैं। बाहर की दुनिया से जुड़कर, अपने लिए जीने से मन में जिस ऊर्जा का प्रवाह होता है, उसका अनुभव घर में ही सीमित रहकर उन्हें कहाँ हो सकता है?


Tuesday, October 30, 2018

गौरैया की मेरे घर से पहचान




बचपन की परिचित गौरैया, जब दिखनी बंद हो गई थीं, तब निगाहें उन्हें  ढूँढती रहती थीं। मैं जगह-जगह बैठे  पक्षियों में देखती थी  की शायद इनमें कभी गौरैया भी दिख जाए। इसके बाद कभी-कभी एक दो गौरैयाँ  बिजली के तारों पर,सबसे दूरी बनाते हुए बैठी दिखीं। उनको नीचे लाने के लिए घर के बाहर चावल डाले और काफी  समय तक डालते रहने पर, एक दो गौरेया आने लगी, पर वहाँ उन्हें शायद कुत्ते, बिल्ली से सुरक्षा का एहसास नहीं था, इसलिए फिर कम आने लगीं। मेरा मन था कि घर में कहीं किसी जगह गौरैया आ कर दाना चुगें जैसा बचपन में होता था। लगता है कि पक्षी भी मन की भाषा समझते हैं। गौरैयाँ अब मेरे घर में चावल खाने के लिए आने लगीं हैं। कहते हैं कि गौरैयाँ काफी समय तक किसी जगह को देखती हैं कि वह सुरक्षित है या नहीं।  बहुत समय तक दाना डालते रहने के बाद आखिर गौरैयों ने  मेरे घर को पहचान लिया है।         

Tuesday, September 4, 2018

शतरंज के खिलाड़ी में सामंतवाद और रीतिकालीन साहित्य के अवसान का आभास

किसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी को गहराई से समझने के लिए, उसके देशकाल, वातावरण, और उद्देश्य से अवगत होना आवश्यक है। शतरंज के खिलाड़ी महान उपन्यासकार प्रेमचन्द की वाजिद अली शाह के शासनकाल को चित्रित करती हुई एक उत्कृष्ट रचना है।

वाजिद अली शाह लखनऊ और अवध के नबाब थे जिनका शासनकाल सन 1847 से 1856 तक रहा। इसी समय अंग्रेजों ने भी भारत में शासन किया। यह हिन्दी साहित्य के इतिहास का आधुनिक काल था जिसके पूर्व रीतिकाल  में साहित्य रचना राजदरबारों तक सीमित हो गई थी। इस समय कवियों को राज दरबारों में आश्रय प्राप्त था जो राजाओं की चाटुकारिता में कविताएं लिखते थे। रीतिकाल के बाद हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में खड़ी बोली गद्य का आविर्भाव हुआ। इस समय के प्रमुख लेखकों में प्रेमचन्द ने सर्वप्रथम यथार्थवाद को अपने उपन्यासों और कहानियों में स्थान दिया। उनका यथार्थवाद तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित था।

Sunday, April 8, 2018

सुखद अनुभूति

कल ही मैंने गौरैया के लिए लिखा हुआ अपना लेख पोस्ट किया और आज ही मेरे घर के सामने बिजली के तार पर सात-आठ गौरैयाँ आकर बैठ गईं जिनमें से तीन नीचे आ गईं। इससे अधिक सुखद अनुभूति नहीं हो सकती।





Saturday, April 7, 2018

कभी रूठी गौरैयाँ जब फ़िर मिलीं


यादों के बहुत से झरोखे होते हैं। किसी भी समय कोई एक झरोखा एक झोंके से खुल जाता है और हम यादों में खो जाते हैं। एक याद से जुड़कर दूसरी याद, दूसरे से तीसरी, आगे और बढ़ते हुए पुराने जीवन में कुछ समय के लिए पहुँचा देती है। ऐसी ही कुछ यादों में से बचपन और युवावस्था से जुड़ी मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या में घुली-मिली गौरैया, एक झरोखे से दिखती है।

Monday, February 12, 2018

जयशंकर प्रसाद के गद्य साहित्य में पद्य और काव्यत्मकता की छाया

जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य साहित्यकार हैं जिन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक तथा निबन्ध सभी विधाओं में रचना की है। छायावादी युग के प्रमुख स्तम्भकारों जैसे पन्त, निराला तथा महादेवी वर्मा के मध्य उनका भी प्रमुख स्थान है। जय शंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 बनारस में हुआ और 15 नवम्बर 1930 में, 47 साल की अल्पायु में ही निधन हो गया। इतनी अल्पावधि में भी प्रसाद ने अपनी प्रतिभा से हिन्दी के साहित्याकाश को आलोकित कर दिया।

प्रसाद ने अपने निबन्धयथार्थवाद और छायावाद’  में छायावाद जिसे रहस्यवाद भी कहा जाता है, का उल्लेख करते हुए लिखा हैकविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुन्दरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूति अभिव्यक्त होने लगी, तब उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया  साथ ही प्रसाद का कहना है, ‘छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है' प्रसाद की रचनाओं में उनके इन्हीं विचारों की अभिव्यक्ति है। 

Tuesday, November 14, 2017

हिंसा और वीभत्सता से ओत-प्रोत आधुनिक पौराणिक उपन्यास

धर्म और साहित्य का सम्बन्ध आज एक नया रूप ले चुका है, जिसके फ़लस्वरूप पौराणिक कथाओं पर आधारित अनेक उपन्यास आजकल लोकप्रिय हो रहे हैं। इन उपन्यासों में पौराणिक पात्रों को नवीन परिवेश में रूपान्तरित कर, बड़ी  कुशलता से आज देश में आक्रामक रूप से हिंसा का प्रश्रय लेती हुई, धार्मिकता का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही इनमें वर्णित ब्राह्णणवाद, जातिवाद, छूआछूत, असमानता और वर्गीय हिंसा तथा घृणा को विस्तृत रूप में व्यक्त किया जा रहा है, जिससे इन विषमताओं के प्रबल होने की संभावनाएँ हैं, जिसके कारण समाज के पुनः पुराने दौर में जाने का खतरा हो सकता है। ऐसे ही उपन्यासों में अमीश त्रिपाठी का ‘मेलुहा के मृत्युंजय’ और अशोक के बैंकर का ‘अयोध्या का राजकुमार’ समाहित हैं।

Sunday, February 7, 2016

महिलाओं का सीमित होता कार्यक्षेत्र

भारतीय सामाजिक संरचना में अधिकांश महिलाओं का दायरा घरेलू कार्यों के लिये और पुरुषों का बाहरी कार्यों के लिये सुनिश्चित किया गया है। महिलाएँ बचपन से ही घरेलू कार्यों को सीखती हैं जिससे व्यस्क होने तक घर की सभी कामों की जिम्मेदारी उठा सकें। युवावस्था से बुढ़ापे तक उनको सभी घरेलू कार्य करने पड़ते हैं और आवश्यकता होने पर भी पुरुषों का सहयोग नहीं मिलता। यह स्थिति घरेलू और कामगार दोनों ही महिलाओं की है। घरेलू कार्यों में महिलाओं की दिनचर्या में कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं होता और ना ही सेवा निवृत्ति की कोई उम्र सीमा होती है। जब तक उनका शरीर शिथिल नहीं होता या वो अस्वस्थ नहीं हो जातीं तब तक घरेलू कार्यों में उनकी व्यस्तता बनी रहती है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 2011-2012 के 68 वें दौर के सर्वेक्षण पर आधारित “घरेलू कार्यों के साथ-साथ विनिर्दिष्ट क्रियाकलापों में महिलाओं की भागीदारी” नामक रिपोर्ट इसी व्यवस्था की पुष्टि करती है। इसके अनुसार घरेलू कार्यों में कार्यरत महिलाओं का अनुपात ग्रामीण और नगरीय, दोनों ही क्षेत्रों में निरन्तर बढ़ा है।

Sunday, November 22, 2015

आलोचना और पूर्वाग्रह

प्रस्तावना: हिन्दी के चर्चित उपन्यासकार’ मिश्र की उपन्यासों और उपन्यासकारों की आलोचना का एक ही पुस्तक में समेटने का बृहद प्रयास है। परन्तु इसमें उनकी पूर्वाग्रहग्रस्त सोच अनेक जगह दृष्टिगत होती है। इस लेख में इन्हीं कुछ लक्षणों को इंगित करने का प्रयास किया गया है।

Thursday, October 8, 2015

व्रत, त्यौहार और रीति-रिवाज: समाज के शिकंजे

भारतीय समाज में व्रत-त्योहार, रीति-रिवाज, मर्यादा, संस्कार आदि सभी स्त्रियों के लिये नियत किये गये हैं और सभी उन पर शिकंजा कसने के हथियार हैं। इनके जाल में उलझकर वो शनैः-शनैः अपनी समस्त स्वतंत्रता खो देती हैं। विवाह होते ही पहले दसवें दिन, फिर एक महिना, उसके बाद साल पूरा होने पर कुछ-कुछ छिरकवा कर लड़की को बदली हुई जीवन-शैली से अभ्यस्त कराया जाता है। एक महीने तक नई बहू को लाल या गुलाबी साड़ी में चौक पर बैठाकर ससुराल की कोई रिश्तेदार एक पारम्परिक गाना गाती है, जिसका कुछ भी मतलब समझे बिना सब कुछ एक कठपुतली की तरह करती जाती हैं। इसके बाद दिनचर्या में उसके बोलने-चालने, हँसने, चलने, उठने-बैठने, खाने-पीने इत्यादि सभी गतिविधियों को नियन्त्रित किया जाता है। स्त्रियों को अपनी इच्छा से कपड़े पहनने की स्वतंत्रता नहीं होती। बहुत से परिवारों में उनको पारम्परिक साड़ी पहनने के लिये बाध्य किया जाता है। इन सबसे धीरे-धीरे उनकी सभी रुचियाँ और प्रतिभा स्वतः ही अलोप होती जाती हैं। एक बँधे-बँधाए ढर्रे पर औरतों का जीवन चलता रहता है। वो भी इन सब की इतनी आदी हो जाती हैं कि उन्हें फिर से कुछ करने के लिये उद्द्यत करना बहुत ही कठिन हो जाता है। किसी समय में आदमी भी धोती कुर्ता पहनते थे।आज सभी पेंट-शर्ट पहनते हैंइसकी वजह पुरूष घर से बाहर जाकर पैसा कमाना बताते हैं। गौर किया जाये तो पहली स्वतंत्रता बाहर निकल कर पैसा कमाने से ही मिलती है जो पुरूषों को मिलती है। फिर इसी क्रम से जुड़ते हुए धीरे-धीरे सभी क्षेत्र में उनकी स्वतंत्रता का दायरा बढ़ता जाता है।
शादी के बाद औरतों को बाहर आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनने के लिये घर से निकलने नहीं दिया जाता। उनको घर के काम करना, बच्चों और बड़ों की देखभाल करने का उत्तरदायित्व दिया जाता है। इस तरह स्त्रियों की आजादी का हनन होता जाता है। घर में दिन-भर काम करते हुए भी वे बेरोजगारों की श्रेणी में गिनी जाती हैं। उनके काम को कभी महत्व नहीं दिया जाता। इसी मानसिकता के कारण आज भी अधिकांश लड़कियों की प्राथमिकता घर सँभालना ही हैं। वो घर वालों की इसी परम्परावादी सोच को ही महत्व देती हैं। हाथ में धन रहने के कारण आदमी अपनी मर्जी के काम अधिकार पूर्वक करते हैं। औरतों को सभी कामों के लिये उन पर निर्भर रहना पड़ता है। उनको अपनी इच्छा से ना चलने देकर उन्हें अपनी इच्छानुसार चलाने का पुरूषों का यह एक बहुत अच्छा तरीका है ।
इसके अतिरिक्त मेहमान घरों में अन्य सदस्यों से मिलने और बातें करने आते हैं परन्तु औरत से केवल खाने- पीने द्वारा आवभगत और घर की साफ़-सफ़ाई की ही उम्मीद की जाती है। घर में उसकी योग्यता उसके द्वारा प्रस्तुत किये गये खाने, नाश्ते और घर की सफ़ाई से आँकी जाती है। उसमें कहीं कोई चूक नहीं होनी चाहिये। नाश्ता गर्म बानाया गया हो और बाजार से ना मँगाया गया हो। खाने में अनेक प्रकार की चीजें हों तभी ग्रहणी योग्य मानी जाती है। उसने अपने जीवन में अन्य क्षेत्रों में अभी तक क्या हासिल किया है, इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं होता। पुरूष वर्ग तो केवल बातें करके ही वाह-वाही लूट लेता है और उसका अतिथि-सत्कार का दायित्व पूरा हो जाता है। औरत को एक पल के लिये भी बैठने का समय नहीं मिलता।
नियमित दिनचर्या ही उन्हें चैन से नहीं बैठने देती, वहीं व्रत-त्यौहार और तरह-तरह के रीति-रिवाज उनको चक्रवात की भाँति घुमा देते हैं। पहले नौदुर्गा  के नौ व्रत या पड़वा और अष्टमी के व्रत से हिन्दी का साल प्रारम्भ होता है। स्त्रियों की भूखे रहकर साल की शुरुआत होती है। अधिकतर व्रत स्त्रियाँ  पति या अपनी संतान (लड़कों) के लिये रखती हैं। एकादशी, पूर्णिमा हर महिने रखने वाले व्रत, फिर हर हफ़्ते होने वाले व्रत अलग चलते रहते हैं। अधिकतर व्रत पति या लड़कों की आयु, धनसम्पत्ति अथवा स्वास्थ्य से जुड़े रहते हैं। जिन स्त्रियों का समाज में कोई प्रतष्ठित स्थान नहीं है।उनमें व्रत के मामले में इतनी शक्ति  आ जाती है कि ऐसा  लगता है कि उनके व्रतों से ही पुरूष-समाज का जीवन चलता है। कुछ व्रत इच्छा से रखे जाते हैं तो कुछ आवश्यक कर दिये जाते हैं। आवश्यक व्रतों को ना रखने की सोचना ही महिलाओं को समाज के कारण भयभीत कर देता है। जन्माष्टमी के व्रत में कृष्ण भगवान के जन्म लेने पर व्रत रखा जाता है। जबकि किसी के पैदा होने पर व्रत रखने का कोई औचित्य नहीं है। ये व्रत यदि घर के सभी सदस्य रखते हैं तो एक उत्सव सा हो जाता है। खास तरह का खाना औरतों का काम बढ़ाता है। हरतालिका का अत्यन्त कठिन होता है। इसकेआने से पहले से औरतों में एक घबराहट होने लगती है । वो ये मनाती हैं कि किसी तरह से ये व्रत अच्छी तरह निकल जाये। भूखे प्यासे रहने के कारण शाम आते-आते अधिकांश औरतें सिर-दर्द और कमजोरी के कारण बिस्तर पर पड़ जाती हैं। इस बीच वो घर के रोज के बँधे कार्यों के लिये उठती हैं क्योंकि वो उन्हें ही करने होते हैं। इस व्रत के हो जाने पर वो शायद साल भर के लिये राहत की साँस लेती होंगी। इसीलिये शायद इस दिन बहुत सी स्त्रियाँ एकत्रित होती हैं कि एक दूसरे पर निगरानी रख सकें कि व्रत रखा है या नहीं। कुछ स्त्रियाँ  करवा चौथ का व्रत भी इसी तरह रखती हैं।
त्यौहारों  की बात करें तो होली एक मस्ती का त्यौहार है पर होली के बाद दौज पर भी स्त्रियों को आने वालों की आवभगत के लिये स्पेशल खाना बना होता है अर्थात घर में कुछ भी हो औरतों को रोज से अधिक खाना बनाना ही होता है, जो उनकी थकान का कारण बनता है। इसी प्रकार दिवाली की दौज पर होता है। कुछ स्त्रियाँ स्वयं पर गर्व करने का कारण समझ कर बढ़-बढ़ कर काम करती हैं क्योंकि उनके जीवन में इसके सिवा करने को कुछ नहीं रहता। व्रत हो तो भूखे रहना पड़ता है और त्यौहार, रीतिरिवाजों में खाना बना पड़ता है। रक्षाबन्धन पर तो राखी बाँधनी हो या नहीं पर औरतें पूरे दिन ही काम में लगी रहती हैं। हर त्यौहार पर कुछ खास खाने की चीज आवश्यक कर दी जाती है जिसके बनाये बिना त्यौहार माना ही नहीं जाता। होली पर गुझियाँ, जन्माष्टमी पर पाग ,सकट चौथ पर तिल के लड्डू, गणेश चौथ पर बेसन के लड्डू, रक्षाबन्धन पर सिवईं  की खीर अर्थात कैसा भी अवसर हो औरतों का ध्यान खाना बनाने में ही लगा रहना चाहिये। प्रत्येक अवसर पर घर को साफ़ रखना भी औरत का ही कर्तव्य है। घर में रहते सब हैं पर औरत ही घर को व्यवस्थित करने में लगी रहती है क्योंकि अतिथि उसकी खातिरदारी को परखने के साथ घर की साज-सज्जा के आधार पर भी स्त्रियों को आँकते हैं।
व्रत त्यौहारों के अतिरिक्त महिलाओं को श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के समय साँस लेने का समय नहीं मिलता। पितृ पक्ष में लड़कों और आदमियों के पितरों का श्राद्ध होता है। जिसमें ब्राम्हण या ब्राम्हणी को को खाना खिलाते हैं। इनकी संख्या एक या कितनी भी हो सकती है। साथ में पुरूष अपने रिश्तेदारों को भी खाने पर बुलाते हैं। खाने वालों की संख्या बढ़ जाती है पर खाना बनाती औरत ही है। पन्द्रह दिन में पुरूष के परिवार के कितने भी श्राद्ध हो सकते हैं। वैसे किसी की मृत्यु पर तेरहवीं, बरसी या चौबरसी पर तो आराम से हलवाई खाना बनाता है पर श्राद्ध में बाजार से कुछ मँगाने में आपत्ति जताई जाती है। इनमें तो ग्रहणी के बनाने से ही निष्ठा दिखती है। ऐसे में कई औरतें बीमार होने पर भी गिरते-पड़ते श्राद्ध का खाना बनाती ही हैं। पुरूष इसमें साथ देते नहीं हैं क्योंकि उन्होंने ये काम तो औरत के लिये ही नियत किये हैं।
स्त्रियों के जीवन का यही सच है। इसी सच के साथ जीती हुई वो अपना जीवन खत्म कर देती हैं। आवश्यकता है कि इस सच को बदला जाये। स्त्रियाँ अपनी खोई हुई रुचियों और प्रतिभा को पुनः जगाएँ। घर को ही अपना जीवन -क्षेत्र ना मानें। इसके अतिरिक्त भी दुनिया में बहुत कुछ है। कुछ करने के लिये घर से बाहर कदम निकालने की हिम्मत करनी चाहिये।  कोई भी काम किसी के लिये असम्भव नहीं होता। घर की चारदीवारी में रहतेरहते स्त्रियाँ इतना आत्मविश्वास खो देती हैं कि अचानक आवश्यकता पड़ने पर वो स्वयं की भी मदद नहीं कर पातीं। आर्थिक स्वतन्त्रता के ना होने से ही स्त्रियाँ समाज के बनाये हुए जाल में फ़ँसी रह जाती हैं। जिससे वो जीवन भर नहीं निकल पातीं हैं। स्त्रियाँ कोई एक रास्ता चुन कर उससे प्रारम्भ करें। अनेक दूसरे रास्ते स्वयं ही जुड़ते जाते हैं और जीवन की शुष्कता समाप्त होकर उसमें ताजगी का आभास होता है। कुछ भी शुरू करने के लिये कभी देर नहीं होती। 
अमिता चतुर्वेदी