Saturday, January 29, 2022

The Violence and Horror Strewn Modern Mythological Novels



The relationship of religion and literature has undergone a transformation lately, because of which novels based on mythological stories have become increasingly popular. The mythological characters have been presented in a new avatar in these novels and thus, quite skillfully, a specific kind of religiosity prevalent in the nation has been cashed in on; one which is aggressively backed by a culture of violence. Besides, these novels also relate in great details the practices of Brahmanism, casteism, untouchability, inequality and sectarian violence and hatred, which potentially create grounds for only further escalating these maladies. As a result, the looming danger of society regressing into primordial values is becoming realer by the day. Amish Tripathi’s The Immortals of Meluha and Ashok K Banker’s Prince of Ayodhya are two such novels which this article takes an analytical look at.

Monday, September 20, 2021

सूखा बरगद में परिलक्षित होती मंज़ूर एहतेशाम की सामाजिक परिस्थितियों से उपजी व्याकुलता

 


हाल ही में हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार मन्जूर एहतेशाम का निधन होने से स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य के एक विशिष्ट अध्याय का अंत हो गया। उनका जन्म 4 अप्रैल को भोपाल में हुआ था और वहीं पर उन्होंने अपनी अंतिम साँस भी ली। उन्होंने अनेक उपन्यास, कहानियाँ व नाटक लिखे जिनके लिए उन्हें सम्मानित किया गया।

उनकी प्रमुख कृतियों में से एक सूखा बरगद उपन्यास उनके बाह्य और आंतरिक संसार का एक विशिष्ट प्रतिबिम्ब रहा है जिसके लिए उन्हें श्रीकान्त वर्मा स्मृति सम्मान और भारतीय भाषा परिषद कलकत्ता का सम्मान प्राप्त हुआ। यह उपन्यास विभाजन के बाद के दौर को याद करते हुए तत्कालीन घटनाओं और माहौल का वर्णन करता है और साथ ही में 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध के समय की घटनाओं को भी समेटे हुए है। उपन्यास की कहानी इसके प्रमुख पात्र रशीदा और सुहेल के माध्यम से देश के वातावरण के युवा वर्ग पर पड़ने वाले प्रभाव पर टिप्पणी करती है।

Thursday, December 3, 2020

अतीत का एक पन्ना- झाँसी की डमडोली


 

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नवम्बर की धीरे-धीरे बढ़ती हुई सर्दी में सुबह के समय छत पर टहलते हुए मैं देख रही थी कि धुँधले आसमान में चार-पाँच दिन से एक लाल रंग की पतंग रोज उड़ती है जो मेरा ध्यान आकर्षित करती थी। मैं सोचती थी कि कैसे स्वच्छंदता से उड़ती हुई एक अनजानी पतंग हर एक से रिश्ता बना लेती है। प्रतिदिन शान्त आसमान में पक्षियों के बीच उड़ती पतंग अपने में मगन रहती थी। कई दिन उस पतंग के उड़ते रहने के बाद एक दिन एकाएक दूसरी हरे रंग की पतंग भी उड़ने लगी। इसके बाद दोनों पतंगों में प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। पहले से उड़ती शान्त पतंग चंचलता से झूमने लगी और ऊँचे आसमान में पहुँच गई। दूसरी पतंग धीरे-धीरे ऊपर बढ़ी और लाल पतंग से पेंच लड़ने लगी। तभी लाल पतंग ने उसे काट दिया। दूसरे दिन फिर वही हरी पतंग आई लेकिन पहले से उड़ती निर्भीक लाल पतंग का मुकाबला करने का साहस न कर सकी और नीचे उतर गई। तीसरे दिन हरी पतंग फिर चुपचाप से आई और पहले से पेंगें बढ़ाती लाल पतंग ने फिर उसका पीछा किया। थोड़ी देर दोनों पतंगों ने पेंच लड़ा लेकिन फिर हरी पतंग बीच में ही नीचे उतर गई। मैं बार-बार टहलना छोड़कर पतंगों की अठखेलियाँ देख रही थी।

Sunday, August 9, 2020

रांगेय राघव का रिपोर्ताज तूफानों के बीच- बंगाल के अकाल का एक संवेदनशील वर्णन




रांगेय राघव का लिखा रिपोर्ताज तूफानों के बीच  हिन्दी साहित्य की एक अमूल्य कृति है जिसको उन्होंने चार भागों में लिखा है- बाँध भाँगे दाओ, एक रात, मरेंगे साथ जिएंगे साथ  एवं अदम्य जीवन । यह रिपोर्ताज सन् 1942-44 के अन्तराल में बंगाल में पड़ने वाले भीषण अकाल की भयावहता का साक्षी है, जिसे पढ़कर वहाँ की विषम परिस्थितियों से उत्पन्न लेखक के अन्तर्मन की व्याकुलता प्रकट होती है। 

Saturday, November 9, 2019

दर्शकों के मन में हलचल पैदा करने वाले नाटक ‘खिड़की’ द्वारा रंगलोक नाट्य उत्सव का समापन




रंगलोक नाट्य महोत्सव के तीसरे संस्करण का इस गुरुवार आगरा शहर के सूरसदन प्रेक्षागृह में प्रिज़्म नाट्य समूह की प्रस्तुति के साथ सफल समापन हुआ। विकास बहरी द्वारा निर्देशित, कहानी के अन्दर कहानी कहता हुआ खिड़की  नाटक, एक लेखक के कहानी के अन्त को खोजने के द्वन्द को व्यक्त करता है। अपने में अलग प्रकार की संवेदनाओं को समेटे हुए यह नाटक दर्शकों को अन्त तक तन्मयता से डूब जाने को विवश करता है। दो पात्रों में सीमित नाटक की कहानी की सुन्दरता को दोनों ही कलाकारों के अपूर्व अभिनय ने अन्त तक बनाए रखा।
कहानी के मुख्य पात्र, जतिन सरना द्वारा अभिनीत, एक लेखक- वेद के माध्यम से अपने लेखन की प्रतिभा को स्वयं अपने और दूसरी पात्र, प्रियंका शर्मा द्वारा अभिनीत, वेदिका की दृष्टि से परखते हुए कहानी पात्रों के मन की गहराईयों में डूबती-उतराती दर्शकों के मन में हलचल पैदा करती है। वेदिका का सहज हास्य और सहज ही  भाव-विह्ववलता और उसके प्रत्युत्तर में वेद की उतनी ही सहजता से प्रतिक्रिया और संवेदना, एक उच्च स्तर के अभिनय-कौशल को व्यक्त करती है।
बिना किसी तड़क-भड़क के सहज-सरल रंगमंचीय सज्जा के साथ पात्रों के कुशल अभिनय से पूर्ण खिड़की नाटक, विकास बहरी के कुशल निर्देशन और सटीक प्रकाश व्यवस्था का भी परिचायक है। आगरा में ‘रंगलोक थियेटर उत्सव’ के अंतर्गत इस सराहनीय नाटक का मंचन, डिम्पी मिश्रा के रंगमंच के उत्तरोत्तर विकास के प्रयास को और ऊँचाईयाँ देने में निश्चित ही सहायक होगा।
अमिता चतुर्वेदी 

Tuesday, July 30, 2019

लुबना सलीम की ‘गुड़म्बा’ नाटक में एकल प्रस्तुति- एक लघु समीक्षा


‘गुड़म्बा’ मशहूर लेखक ज़ावेद सिद्दीकी द्व्रारा लिखित तथा सलीम आरिफ़ द्वारा निर्देशित एक संवेदनशील एकल नाटक, 27 जुलाई को सूरसदन प्रेक्षागृह में अभिनीत किया गया। नाटक के प्रारम्भ में सहजता से अभिमुख होती हुई, इस एकल नाटक की कलाकार लुबना सलीम ने क्षण भर में दर्शकों से आत्मीयता स्थापित कर ली, फिर एक पात्र में अनेक पात्रों को जीती हुई, कभी अपने जीवन के पुराने समय और कभी वर्तमान में दर्शकों को पहुँचाती रही। नाटक की मुख्य और एकमात्र पात्रा अमीना(लुबना सलीम) अपने पति, बेटे और बहू के साथ रहती है। एक औरत की समाज में निम्नतर स्थिति इस नाटक के माध्यम से स्पष्ट होती है, जिसको उसका पिता, पति और पति के घर वाले अपने आधीन रखते हैं।

Sunday, April 28, 2019

फिल्मों के विदाई के गीतों में महिलाओं की असहायता का महिमामंडन

Source: Shemaroo Videos  
अमिता चतुर्वेदी 

एक लड़की के विवाह से ही ‘विदा’ शब्द जुड़ा होता है क्योंकि उसके जीवन में अपने घर से जिस तरह का निष्कासन होता है, वह और किसी के साथ नहीं होता। एक लड़की के अतिरिक्त घर का कोई भी सदस्य वापस अपने घर में एक मेहमान के रूप में नहीं आता। विदा के समय घर के दरवाजे से कदम निकालते ही उसे आभास कराया जाता है कि यह घर अब उसका नहीं है। उसे अपने घर से परायेपन की अनुभूति होने लगती है। ‘पराया’ का सीधा अर्थ लगाया जा सकता है कि अब लड़की के सुख-दुख से उसके घर वालों का कोई सम्बन्ध नहीं है और विदा के समय निकले पहले  कदम के साथ ही उसका सम्बन्ध उस घर से सदा के लिए समाप्त हो जाता है; उस घर से, जहाँ उसके बचपन, किशोरावस्था और यौवन की यादें उसके मन में सदा समायी रहती हैं ।
यही परम्परा और प्रथा पुराने समय से लेकर आज तक चली आ रही है। एक लड़की के पराये होने के सामजिक बोध के इस कटु सत्य पर आधारित, फ़िल्मों में कितने ही गाने बनाए गए हैं, जिनमें वह अपने घर-आँगन की याद कर रही होती है। ये गाने लड़की के पराये होने के बोध को व्यक्त करने के साथ, समाज की इसी सोच को और पुष्ट करते हैं। प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ गीतों का विश्लेषण-

Tuesday, March 19, 2019

एक सड़क-दुर्घटना का समाजशास्त्र




सात दिसम्बर 2017 की रात एक दुर्घटना ने मेरे जीवन में अनेक नये अनुभव जोड़ दिए। रोज की तरह जिम से, स्कूटी पर लौटते हुए, मैं अपनी कॉलौनी तक पहुँचने वाली थी। डिवाईडर के कट पर खड़ी हुई थी, बस सड़क को पार कर सामने जाना था। हेलमेट पहने हुए थी। मैंने सीधे हाथ का इंडीकेटर दे दिया था। वाहन एक के बाद एक आ रहे थे, मेरी नजर बाँईं तरफ़ लगी हुई थी। जब मैंने देखा कि अगला वाहन कुछ दूर है तो सड़क पार करने लगी। थोडा सा बढ़ी थी कि सहसा एक बीस-बाईस साल के मोटर साईकिल सवार लड़के ने मेरी स्कूटी में जोर से ट्क्कर मार दी। वह लड़का इतनी तीव्रता से आया कि न तो मुझे वह आता हुआ दिखा और न ही मुझे टक्कर होने की आवाज सुनाई दी, जो लोगों को काफ़ी दूर तक सुनाई दी थी। मुझे केवल पता चला कि मुझे कुछ हुआ है। शायद हल्की सी बेहोश हो चुकी थी। बस इतना ध्यान रहा कि कोई पूछ रहा है कि आपके पति का क्या नाम है, जो मैंने बता दिया। पूछने वाले पास ही स्थित पुलिस चौकी के आदमी थे।

Tuesday, October 30, 2018

गौरैया की मेरे घर से पहचान




बचपन की परिचित गौरैया, जब दिखनी बंद हो गई थीं, तब निगाहें उन्हें  ढूँढती रहती थीं। मैं जगह-जगह बैठे  पक्षियों में देखती थी, शायद इनमें कभी गौरैया भी दिख जाए। इसके बाद कभी-कभी एक दो गौरैयाँ  बिजली के तारों पर,सबसे दूरी बनाते हुए बैठी दिखीं। उनको नीचे लाने के लिए घर के बाहर चावल डाले और काफी  समय तक डालते रहने पर, एक दो गौरेया आने लगी, पर वहाँ उन्हें शायद कुत्ते, बिल्ली से सुरक्षा का एहसास नहीं था, इसलिए फिर कम आने लगीं। मेरा मन था कि घर में कहीं किसी जगह गौरैया आ कर दाना चुगें जैसा बचपन में होता था। लगता है कि पक्षी भी मन की भाषा समझते हैं। गौरैयाँ अब मेरे घर में चावल खाने के लिए आने लगीं हैं। कहते हैं कि गौरैयाँ काफी समय तक किसी जगह को देखती हैं कि वह सुरक्षित है या नहीं।  बहुत समय तक दाना डालते रहने के बाद आखिर गौरैयों ने  मेरे घर को पहचान लिया है।                                                               अमिता चतुर्वेदी   

Tuesday, September 4, 2018

शतरंज के खिलाड़ी में सामंतवाद और रीतिकालीन साहित्य के अवसान का आभास

किसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी को गहराई से समझने के लिए, उसके देशकाल, वातावरण, और उद्देश्य से अवगत होना आवश्यक है। शतरंज के खिलाड़ी महान उपन्यासकार प्रेमचन्द की वाजिद अली शाह के शासनकाल को चित्रित करती हुई एक उत्कृष्ट रचना है।

वाजिद अली शाह लखनऊ और अवध के नबाब थे जिनका शासनकाल सन 1847 से 1856 तक रहा। इसी समय अंग्रेजों ने भी भारत में शासन किया। यह हिन्दी साहित्य के इतिहास का आधुनिक काल था जिसके पूर्व रीतिकाल  में साहित्य रचना राजदरबारों तक सीमित हो गई थी। इस समय कवियों को राज दरबारों में आश्रय प्राप्त था जो राजाओं की चाटुकारिता में कविताएं लिखते थे। रीतिकाल के बाद हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में खड़ी बोली गद्य का आविर्भाव हुआ। इस समय के प्रमुख लेखकों में प्रेमचन्द ने सर्वप्रथम यथार्थवाद को अपने उपन्यासों और कहानियों में स्थान दिया। उनका यथार्थवाद तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित था।