Sunday, April 8, 2018

सुखद अनुभूति

कल ही मैंने गौरैया के लिए लिखा हुआ अपना लेख पोस्ट किया और आज ही मेरे घर के सामने बिजली के तार पर सात-आठ गौरैयाँ आकर बैठ गईं जिनमें से तीन नीचे आ गईं। इससे अधिक सुखद अनुभूति नहीं हो सकती।





Saturday, April 7, 2018

कभी रूठी गौरैयाँ जब फ़िर मिलीं


यादों के बहुत से झरोखे होते हैं। किसी भी समय कोई एक झरोखा एक झोंके से खुल जाता है और हम यादों में खो जाते हैं। एक याद से जुड़कर दूसरी याद, दूसरे से तीसरी, आगे और बढ़ते हुए पुराने जीवन में कुछ समय के लिए पहुँचा देती है। ऐसी ही कुछ यादों में से बचपन और युवावस्था से जुड़ी मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या में घुली-मिली गौरैया, एक झरोखे से दिखती है।

Monday, February 12, 2018

जयशंकर प्रसाद के गद्य साहित्य में पद्य और काव्यत्मकता की छाया

जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य साहित्यकार हैं जिन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक तथा निबन्ध सभी विधाओं में रचना की है। छायावादी युग के प्रमुख स्तम्भकारों जैसे पन्त, निराला तथा महादेवी वर्मा के मध्य उनका भी प्रमुख स्थान है। जय शंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 बनारस में हुआ और 15 नवम्बर 1930 में, 47 साल की अल्पायु में ही निधन हो गया। इतनी अल्पावधि में भी प्रसाद ने अपनी प्रतिभा से हिन्दी के साहित्याकाश को आलोकित कर दिया।

प्रसाद ने अपने निबन्धयथार्थवाद और छायावाद’  में छायावाद जिसे रहस्यवाद भी कहा जाता है, का उल्लेख करते हुए लिखा हैकविता के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुन्दरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूति अभिव्यक्त होने लगी, तब उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया  साथ ही प्रसाद का कहना है, ‘छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है' प्रसाद की रचनाओं में उनके इन्हीं विचारों की अभिव्यक्ति है। 

Tuesday, November 14, 2017

हिंसा और वीभत्सता से ओत-प्रोत आधुनिक पौराणिक उपन्यास

धर्म और साहित्य का सम्बन्ध आज एक नया रूप ले चुका है, जिसके फ़लस्वरूप पौराणिक कथाओं पर आधारित अनेक उपन्यास आजकल लोकप्रिय हो रहे हैं। इन उपन्यासों में पौराणिक पात्रों को नवीन परिवेश में रूपान्तरित कर, बड़ी  कुशलता से आज देश में आक्रामक रूप से हिंसा का प्रश्रय लेती हुई, धार्मिकता का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही इनमें वर्णित ब्राह्णणवाद, जातिवाद, छूआछूत, असमानता और वर्गीय हिंसा तथा घृणा को विस्तृत रूप में व्यक्त किया जा रहा है, जिससे इन विषमताओं के प्रबल होने की संभावनाएँ हैं, जिसके कारण समाज के पुनः पुराने दौर में जाने का खतरा हो सकता है। ऐसे ही उपन्यासों में अमीश त्रिपाठी का ‘मेलुहा के मृत्युंजय’ और अशोक के बैंकर का ‘अयोध्या का राजकुमार’ समाहित हैं।

Sunday, February 7, 2016

महिलाओं का सीमित होता कार्यक्षेत्र

भारतीय सामाजिक संरचना में अधिकांश महिलाओं का दायरा घरेलू कार्यों के लिये और पुरुषों का बाहरी कार्यों के लिये सुनिश्चित किया गया है। महिलाएँ बचपन से ही घरेलू कार्यों को सीखती हैं जिससे व्यस्क होने तक घर की सभी कामों की जिम्मेदारी उठा सकें। युवावस्था से बुढ़ापे तक उनको सभी घरेलू कार्य करने पड़ते हैं और आवश्यकता होने पर भी पुरुषों का सहयोग नहीं मिलता। यह स्थिति घरेलू और कामगार दोनों ही महिलाओं की है। घरेलू कार्यों में महिलाओं की दिनचर्या में कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं होता और ना ही सेवा निवृत्ति की कोई उम्र सीमा होती है। जब तक उनका शरीर शिथिल नहीं होता या वो अस्वस्थ नहीं हो जातीं तब तक घरेलू कार्यों में उनकी व्यस्तता बनी रहती है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 2011-2012 के 68 वें दौर के सर्वेक्षण पर आधारित “घरेलू कार्यों के साथ-साथ विनिर्दिष्ट क्रियाकलापों में महिलाओं की भागीदारी” नामक रिपोर्ट इसी व्यवस्था की पुष्टि करती है। इसके अनुसार घरेलू कार्यों में कार्यरत महिलाओं का अनुपात ग्रामीण और नगरीय, दोनों ही क्षेत्रों में निरन्तर बढ़ा है।

Sunday, November 22, 2015

आलोचना और पूर्वाग्रह

प्रस्तावना: हिन्दी के चर्चित उपन्यासकार’ मिश्र की उपन्यासों और उपन्यासकारों की आलोचना का एक ही पुस्तक में समेटने का बृहद प्रयास है। परन्तु इसमें उनकी पूर्वाग्रहग्रस्त सोच अनेक जगह दृष्टिगत होती है। इस लेख में इन्हीं कुछ लक्षणों को इंगित करने का प्रयास किया गया है।

Tuesday, June 23, 2015

'अपने अपने अजनबी' और वैयक्तिक यथार्थबोध


प्रस्तावना:  प्रस्तुत लेख अज्ञेय के उपन्यास 'अपने अपने अजनबी' के मूल्यांकन द्वारा हिन्दी साहित्य में वैयक्तिक यथार्थबोध के सिद्धांत की यथार्थवाद के परिपेक्ष्य में संभावनाएं खोजने का प्रयास करता है। यह लेख मेरे हिंदी साहित्य में एम. फिल. की उपाधि के लिए प्रस्तुत किए गए लघु-शोध प्रबंध पर आधारित रचना है। 

Friday, May 1, 2015

संघर्ष और चुनौती.

कभी-कभी जब शहर के कोलाहल, आलीशान इमारतों, भागती सड़कों से दूर खुले वातावरण में निकलती हूँ तो एक तरफ़ छोटे-छोटे टूटे-फ़ूटे, गरीबी ओढ़े हुए घर और दूसरी ओर नई कॉलोनियों एपार्टमेन्ट्स का रूप लेते खेत और मैदान दिखाई देते हैं। इन घरों में सुबह-सुबह से ही काम करती औरतें और फिर मजदूरी करने जाते हुए स्त्री और पुरुष दोनों दिखाई देते हैं जिनको पूरे दिन मेहनत करके अपना जीवन यापन करना पडता है। उनके बच्चे दिन भर निरर्थक भागते रहते हैं जिनका कोई सुनहरा भविष्य नहीं होता। यद्यपि गाँवों में बहुत से बच्चे पढ़ने जाते हैं परन्तु उनका ध्येय अधिक से अधिक सातवीं या आठवीं कक्षा तक पढ़ने का होता है। उसके बाद लड़कों को किसी छोटे-मोटे काम पर लगा दिया जाता है और और उनके माँ-बाप को लड़कियों के विवाह की चिन्ता सताने लगती है। शहरों में धन के अभाव में स्त्रियों को दूसरों के घर बर्तन माँजने, सफ़ाई करने या  खाना बनाने के लिये जाना पड़ता है।
ऐसे ही एक गरीब परिवार की औरत मेरे सम्पर्क में आई जो घरों में बर्तन माँजने और झाड़ू पौंछा करने का काम करती है। उसके पति की कुछ समय नौकरी रही परंतु थोड़े समय पश्चात् छूट गई। उसके बाद भी कई बार नौकरी लग कर छूट गई। औरत का परिवार असहाय अवस्था में आ गया। उसके बच्चों की पढ़ाई का समय आया। माँ का बहुत मन था कि बच्चे शिक्षित हों पर पिता का मानना था कि बच्चों की पढ़ाई का कोई औचित्य नहीं है। पति के विरोध के बाद भी उसने स्वयं काम करने का फ़ैसला लिया। यह उसके लिये नया और साहसिक कदम था क्योंकि इसके पहले बहुत कम ही अकेले घर से बाहर निकली थी। वह घरों में जाकर काम करने लगी। उसे अपने रिश्तेदारों और पड़ौसियों से छिपकर जाना पड़ता था क्योंकि घर में रहने वाली महिला जब बाहर कदम रखती है तो उसका बहुत तीव्रता से विरोध होता है। विरोध होने के बाद भी काम शुरु करके उसने अपनी कमाई से बच्चों को पढ़ाना प्रारम्भ किया।
सबसे बड़ा लड़का आठवीं कक्षा तक पढ़ा, पर फिर उसका पढ़ने में मन लगना बन्द हो गया। लेकिन इसके बाद उसके बेटे की एक चेन फ़ैक्ट्री में नौकरी लग गई। अब वह स्त्री और उसका बेटा मिलकर घर चलाने लगे। वह अपनी बेटियों को पढ़ाने में तत्पर हो गई। परन्तु अभी उस महिला के साहस की और परीक्षा होनी थी। एक दिन बेटा साइकिल से काम पर जा रहा था, तभी एक ट्रक की चपेट में आकर उसकी मृत्यु हो गई। इतना बड़ा आघात लगने से वह एकदम टूट गई । उसे सरकार से मुआवजे की उम्मीद थी जो लोगों ने उसे बँधाई थी पर वो मुआवजा भी बहुत कोशिश करने पर भी उसे नहीं मिला। कुछ समय तो उसका प्रत्येक कार्य से मन उखड़ गया परन्तु अपने बच्चों का भविष्य बनाने की लगन में उसने फिर से काम करना शुरू किया। बच्चों की पढ़ाई निरन्तर चलती रही। बड़ी बेटी का मन भी अपने भाई जितना ही लगा, लेकिन  जीवन की आवश्यकतानुसार उसकी पढ़ाई हो गई। दूसरी बेटी भी  स्कूल जाती थी। उसका पढ़ने में मन लगा। आज वो बीए कर रही है।
एक सुविधाविहीन स्त्री ने अपने बल पर सभी बच्चों को शिक्षा दिलवाई। उसके इस प्रयत्न में पूरी सच्चाई और एकाग्रता देख कर कुछ लोग प्रभावित हुए और उन्होंने उसकी सहायता भी की परन्तु उस महिला का स्वयं का अटल निश्चय और लगन एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस महिला की हिम्मत और लगन मुझे बहुत प्रेरणा देती थी। अधिकांश सुविधा सम्पन्न महिलाएँ जीवन भर घर में बैठी  रहती हैं और कुछ ना कर पाने के लिये परिस्थितियों का रोना रोती रहती हैं जबकि सच तो यह है कि कुछ करने की इच्छा और हिम्मत हो तो कोई भी काम असम्भव नहीं है। इस महिला ने भी समाज और पति का विरोध झेला। उसको भी सब कुछ सरलता से नहीं मिला और अभी भी वह संघर्ष में लगी हुई है।

-अमिता चतुर्वेदी 

Thursday, March 26, 2015

शिवानी का अनमोल साहित्य।

पढ़ने का शौक रखने वाले कोई भी कहानी, उपन्यास, या पत्रिका बिना पढ़े नही रह पाते हैं। वे हर चीज को इतना तल्लीन होकर पढ़ते हैं कि उन्हें समय की सुध ही नहीं रहती। साठ- सत्तर के दशक के पाठक इन्द्रजाल कॉमिक्स, चन्दामामा, नन्दनसाप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि पढ़ कर बड़े हुए अनेक लोगों ने इन्हें ही पढ़तेपढ़ते युवावस्था में प्रवेश किया और जैसे-जैसे उनके पढ़ने का दायरा बढ़ा। बेहतर उपन्यासों के साथ ही मनोहर कहानियाँ ,सत्यकथाएँ जैसी सनसनीखेज पत्रिकाएँ उनके सामने आती थीं। कुछ पाठकों को इनमें से अच्छा साहित्य पढ़ने के लिया प्रेरित किया जाता है। ऐसे पाठकों को एक सुन्दर दिशा मिल जाती है जिस पर वे सदैव चलते जाते हैंहिन्दी उपन्यासों में आचार्य चतुरसेन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बन्किम चन्द्र आदि द्वारा लिखे गये उपन्यास सदा ही लोकप्रिय रहे हैं। इन्ही नामों में अपनी अलग पहचान बनाई है लोकप्रिय लेखिका शिवानी ने, जिनकी रचनाओं ने पाठकों पर अमिट छाप छोड़ी है। शिवानी का नाम लेते ही कुमाऊँ की पहाड़ियों के दृश्य आँखों के सामने घूम जाते हैं। उनकी रचनाओं में उल्लेखनीय हैं ‘विषकन्या’, ‘शमशान चम्पा’, ‘कृष्णकली’, भैरवी’, ‘चौदह फेरे’, ‘सुरंगमा’, आदि जो पाठकों के दिलों के करीब हैं। सुरंगमा’ का वह धारावाहिक जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपा करता था, वह आज भी मेरे पास संग्रहित रखा हुआ है।
अपनी नायिका की सुन्दरता का वह इतना सजीव चित्रण करतीं थीं कि लगता था कि वह समक्ष खड़ी हुई है। कभी लगता था कि शायद कुमाऊँ की पहाड़ियों पर वह असीम सुन्दर नायिका अपनी माँ के बक्से से निकाली हुई साड़ी पहने असाधारण लगती हुई खड़ी हो। कहीं किसी घर में ढोलक की थाप से उत्सव का वर्णन होता है ,तो कही कोई तेज तर्रार जोशी ब्राह्मण आदेश देता फिरता है। परिवार की भरी भरकम ताई खाट पर बैठी हैं और नायिका का नायक उसे छिपकर देख रहा है। कभी नायिका का एक पुरानी हवेली में जाना और एक बुढिया के अट्टहास से उसका सहम जाना। ये सभी वर्णन हमारी आँखों के सामने सचित्र उभर आते हैं।
शिवानी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। मन करता था कि कभी वह मिलें तो उनसे पूछूँ कि उनकी कहानियों के पात्र क्या सच में कहीं हैं। यद्यपि अपने अन्तिम काल में वह बहुत कम लिखने लगीं थीं। मै उनके उपन्यासों का इन्तजार करती थी, पर शायद तब तक उन्होंने लिखना बन्द कर दिया था। परन्तु उनके जितने भी उपन्यास और कहानी संग्रह हैं, वे हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

-अमिता चतुर्वेदी