Thursday, March 26, 2015

शिवानी का अनमोल साहित्य।

पढ़ने का शौक रखने वाले कोई भी कहानी, उपन्यास, या पत्रिका बिना पढ़े नही रह पाते हैं। वे हर चीज को इतना तल्लीन होकर पढ़ते हैं कि उन्हें समय की सुध ही नहीं रहती। साठ- सत्तर के दशक के पाठक इन्द्रजाल कॉमिक्स, चन्दामामा, नन्दनसाप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि पढ़ कर बड़े हुए अनेक लोगों ने इन्हें ही पढ़तेपढ़ते युवावस्था में प्रवेश किया और जैसे-जैसे उनके पढ़ने का दायरा बढ़ा। बेहतर उपन्यासों के साथ ही मनोहर कहानियाँ ,सत्यकथाएँ जैसी सनसनीखेज पत्रिकाएँ उनके सामने आती थीं। कुछ पाठकों को इनमें से अच्छा साहित्य पढ़ने के लिया प्रेरित किया जाता है। ऐसे पाठकों को एक सुन्दर दिशा मिल जाती है जिस पर वे सदैव चलते जाते हैंहिन्दी उपन्यासों में आचार्य चतुरसेन, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बन्किम चन्द्र आदि द्वारा लिखे गये उपन्यास सदा ही लोकप्रिय रहे हैं। इन्ही नामों में अपनी अलग पहचान बनाई है लोकप्रिय लेखिका शिवानी ने, जिनकी रचनाओं ने पाठकों पर अमिट छाप छोड़ी है। शिवानी का नाम लेते ही कुमाऊँ की पहाड़ियों के दृश्य आँखों के सामने घूम जाते हैं। उनकी रचनाओं में उल्लेखनीय हैं ‘विषकन्या’, ‘शमशान चम्पा’, ‘कृष्णकली’, भैरवी’, ‘चौदह फेरे’, ‘सुरंगमा’, आदि जो पाठकों के दिलों के करीब हैं। सुरंगमा’ का वह धारावाहिक जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपा करता था, वह आज भी मेरे पास संग्रहित रखा हुआ है।
अपनी नायिका की सुन्दरता का वह इतना सजीव चित्रण करतीं थीं कि लगता था कि वह समक्ष खड़ी हुई है। कभी लगता था कि शायद कुमाऊँ की पहाड़ियों पर वह असीम सुन्दर नायिका अपनी माँ के बक्से से निकाली हुई साड़ी पहने असाधारण लगती हुई खड़ी हो। कहीं किसी घर में ढोलक की थाप से उत्सव का वर्णन होता है ,तो कही कोई तेज तर्रार जोशी ब्राह्मण आदेश देता फिरता है। परिवार की भरी भरकम ताई खाट पर बैठी हैं और नायिका का नायक उसे छिपकर देख रहा है। कभी नायिका का एक पुरानी हवेली में जाना और एक बुढिया के अट्टहास से उसका सहम जाना। ये सभी वर्णन हमारी आँखों के सामने सचित्र उभर आते हैं।
शिवानी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। मन करता था कि कभी वह मिलें तो उनसे पूछूँ कि उनकी कहानियों के पात्र क्या सच में कहीं हैं। यद्यपि अपने अन्तिम काल में वह बहुत कम लिखने लगीं थीं। मै उनके उपन्यासों का इन्तजार करती थी, पर शायद तब तक उन्होंने लिखना बन्द कर दिया था। परन्तु उनके जितने भी उपन्यास और कहानी संग्रह हैं, वे हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

-अमिता चतुर्वेदी 

Tuesday, February 17, 2015

एक सुखद पहल

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जब उसे कुछ अधूरापन सा लगता है। ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। मुझे भी लगता था कि विवाह पूर्व एम. ए. के पश्चात् मैने कुछ नही किया। अपनी किताबें याद आती थीं। उनको पढ़ने का मन होता था कभी सन्गीत का कोर्स याद आता था तो कभी हिन्दी और कभी संस्कृत की पुस्तकों को याद करती थी। फिर से कुछ करने की तीव्र इच्छा उत्पन्न होती रहती थी । बड़ा बेटा इन्जीनियरिंग के लिये भिलाई  चला गया। उसके जाने के बाद छोटे बेटे से मै ये सब बातें करती थी। उसको महसूस होता था कि मेरा आगे कुछ करने का बहुत मन है। उसने मेरे मन को समझ कर लगातार कोशिश शुरु कर दी।  तभी से हम दोनों सोचने लगे।  फिर  पी एच डी करने का  निर्णय लिया। छोटे बेटे ने  दिल्ली से जर्नलिज्म किया इसलिए उसका साथ लगातार बना रहा। पी एच  डी  से पहले एम फिल्‌ करनी थी।  मालूम हुआ कि एम फिल् के लिये एम. ए. आवश्यक है और आगरा यूनिवर्सिटी में यह दो साल पहले का होना जरूरी था। पह्ले तो मन में निराशा हुई परन्तु फिर मन को तैयार कर लिया और एम. ए. करने का निश्चय कर लिया ।  इस इरादे ने जीवन को  एक गति देकर सुखद अनुभूति से भर दिया। इतना अवश्य है कि बहुत समय के बाद किसी कार्य को फिर से शुरू करने के लिये एक साथ आवश्यक होता है वह मेरे बेटों ने दिया। प्रारम्भ में पति और छोटे बेटे के सहयोग से एम का सफ़र  शुरू हुआ. आगे चलकर छोटे बेटे का साथ निरंतर मिला और समय-समय पर बड़े बेटे का भी साथ मिला। उसने भी अनेक अवसर पर मेरा  साथ दिया।
 एम फिल में मेरे  लघु शोध –प्रबन्ध  का विषय था 'अपने अपने अजनबी’ में यथार्थ बोध। यह अज्ञेय जी का सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। इस विषय का चयन करने की प्रेरणा मुझे अज्ञेयजी की कहानी रोज’ को पढ़ कर प्राप्त हुई।जो मेरे इग्नू के कोर्स में थी। इसमें एक स्त्री की संवेदना इतनी सार्थकता से व्यक्त हुई है मानो लेखक स्त्री की एक - एक गतिविधि को अपने समक्ष होते देख रहा है। स्त्री की भावनाओं से जुड कर पाठक की भावनाओं में एकात्मकता स्थापित हो जाती है अतः अज्ञेय जी की लेखन शैली से प्रभावित होकर मैने उनके उपन्यास अपने अपने अजनबी का चयन किया। उपन्यास इतनी संवेदनाओं को समेटे हुए है कि मैने उसे अनेक बार पढ़ा।एम. ए. और फिर एम फिल करने से पढाई से फिर से जुड्ने का अवसर मिला और फिर इस एक रास्ते पर चलने से अनेक रास्ते खुल गये।विवाह के तीस वर्ष बाद फिर से पढना चुनौती से कम नही लग रहा था। पेन चलाना भी भूल गई थी। बहुत साहस करके अपने इरादे को मन मेँ मजबूती देती हुई एम. ए. के सफ़र पर चल दी और फिर एम. ए. करने में सफलता मिल गई। इसके बाद एम फिल्‌  रेग्युलर करनी थी। मन में घबराहट होने लगी कि और विद्यार्थियों के साथ किस तरह पढूगी?अध्यापक का सामना कैसे करूगीपर बडी सरलता से सब होता गया। 
एम. ए. से पूर्व करीब तीन वर्ष पह्ले एक स्कूटी ख़रीदी। इतने सालों में घर से अकेले निकलना भूल गई थी। कुछ दिनों स्कूटी चलाने का अभ्यास किया। सर्व प्रथम जिस दिन स्कूटी से अकेले जाकर आधा किलोमीटर   दूर  दुकान से एक पेन खरीद कर लाई। उस दिन मेरी खुशी का ठिकाना नही था। इसके बाद दूसरी बार पाँच छः किलोमीटर का रास्ता तय करके अपना एक काम और किया ।खुली सड़क पर स्कूटी चलाते हुए मन  एकदम  उन्मुक्त होकर स्वतंत्रता महसूस कर रहा था। वही दिन याद आ रहे थे जो विवाह से पूर्व साईकिल से एम. ए. के लिये जाने की स्वतंत्रता लिए हुए थे। उस दिन आगरा कुछ अलग लगा। एक बँधा सा सीमित सा जीवन नई राह पर चल पड़ा। स्कूटी सीखने से एम. ए. और एम फिल् करने में बहुत सहायता मिली।

 इस नये सफर से आज की दुनिया से पुनजुड़ सकी। प्रत्येक कार्य चाहे वह बैंक का हो ,या पोस्ट ऑफ़िस का हो,या फोटो स्टेट की दुकान हो,प्रत्येक स्थान पर जाने का साहस होने लगा।प्रत्येक कार्य करने के लिये आत्मविश्वास आ गया।हर क्षेत्र में ज्ञान के नये अवसर मिले। मेरा यह सपना दोनों बेटों के सहयोग से पूरा हो सका, जिसमें थोड़ा सहयोग पति का भी रहा। अपने पर इतना तो विश्वास करना चाहती हूँ कि मै इस यात्रा को उत्तरोत्तर जारी रख सकूंगी।